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रविवार, 5 सितंबर 2010

ज़हरीला धुआँ

नज़्में भी चीख़तीं हैं
अपने जिस्म की
परछाई देख

कितना ज़हरीला था
वो धुआँ
जो तुम उगलते रहे....!!

2 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने ..

    http://oshotheone.blogspot.com

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  2. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा , आप हमारे ब्लॉग पर भी आयें. यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "फालोवर" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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